डॉ. दीपक अग्रवाल
झांसी/अमरोहा/उत्तर प्रदेश (सनशाइन न्यूज)
प्रथम क्रांति के एक अल्पज्ञात बलिदानी पूरन कोरी को श्रद्धांजलि देने के लिए क्षेत्रीय इतिहास संकलन एवं लेखन अभियान के तत्वावधान में एक सभा का आयोजन इनके वंशज हृदेश वर्मा के यहाँ किया गया।
बड़े बलिदान के बाद भी पूरन गुमनाम
इस कार्यक्रम के बारे में अभियान के संस्थापक और संचालक ग्राम फीना बिजनौर निवासी इतिहासकार इंजीनियर हेमन्त कुमार ने बताया कि प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में अंग्रेजों से झांसी की रक्षा के लिए रानी लक्ष्मीबाई तथा झांसी के सैनिकों ने जान की बाजी लगा दी। इन्हीं वीरगति प्राप्त सैनिकों में एक थे पूरन कोरी। बड़े बलिदान के बाद भी पूरन कोरी लगभग गुमनाम ही रहे। क्षेत्रीय इतिहास संकलन एवं लेखन अभियान के अंतर्गत गुमनाम क्रांतिकारियों पर खोज कार्य भी किया जाता है। इस क्रम में पूरन कोरी के कुटुंब व वंशजों को ढूंढकर गोष्ठी की गई।
हेमन्त कुमार ने आगे बताया कि मार्च 1858 को अंग्रेजों के साथ युद्ध के दौरान ये उन्नाव द्वार पर स्थापित तोप के प्रभारी थे। मोर्चा संभालने के दौरान इन्होंने वीरगति पाई। रानी लक्ष्मीबाई की सुप्रसिद्ध अंगरक्षिका और हमशक्ल कही जाने वाली झलकारी बाई इन्हीं की पत्नी थीं।
झलकारी बाई का जन्म झांसी के निकट भोजला गाँव में हुआ और पूरन कोरी नयापुरा में जन्मे। पूरन कोरी से विवाह के उपरांत झलकारी बाई झांसी की रानी लक्ष्मीबाई के संपर्क में आईं और अपनी योग्यता के बल पर उनकी सैनिक बन अंगरक्षिका बनी। प्रथम क्रांति में झलकारी बाई ने भी वीरगति पाई। विगत तीन दशकों में विभिन्न लेखकों और सामाजिक कार्यकर्ताओं के प्रयासों से झलकारी बाई के नाम का प्रसार प्रचार किया परंतु उस पूरनलाल अभी भी गुमनाम ही हैं। इंटरव्यू के दौरान हृदेश वर्मा ने बताया कि अभी तक पूरन कोरी की प्रतिमा बनने या लगने की बात संज्ञान में नहीं है। इनके शिलापट्ट के बारे में भी स्थिति शून्य है। गोष्ठी में अभियान की ओर से पूरन कोरी का विवरण युक्त तथा इन्हीं को समर्पित एक अभिनंदन पत्र एवं शाल हृदेश वर्मा को भेंट किया गया।
हेमन्त कुमार ने बताया कि नयापुरा की स्थिति के संबंध में इंटरनेट पर उपलब्ध जानकारियों से कड़िया जोड़कर पता निकाला गया। इस कार्य में सिंचाई विभाग में सहायक अभियंता विनोद कुमार खरे ने बताये सूत्र के आधार पर उल्लेखनीय जमीनी कार्य कर वंशजों तक पहुंचने का मार्ग प्रशस्त किया।
इस मौके पर श्री हृदेश वर्मा की माता जी श्रीमती द्रोपदी देवी वर्मा, पत्नी श्रीमती नेहा वर्मा, बड़ा बेटाअयंश वर्मा तथा छोटा बेटा अविक वर्मा मौजूद रहे । क्षेत्रीय इतिहास संकलन एवं लेखन अभियान की ओर से संस्थापक संयोजक इंजीनियर हेमन्त कुमार फीना बिजनौर शुभचिंतक एवं सामाजिक कार्यकर्ता झाँसी से राजेंद्र कौशिक झाँसी से विनोद खरे पुखरायां कानपुर देहात से बृजेंद्र संखवार कन्नौज से संजय कुमार झाँसी से इरसाद अली एवं हमीरपुर से पुष्पेंद्र कुमार मौजूद रहे।
45 गुमनाम सेनानियों की खोज
क्षेत्रीय इतिहास संकलन एवं लेखन अभियान की स्थापना फीना बिजनौर निवासी तथा सिंचाई विभाग में सहायक अभियन्ता हेमन्त कुमार ने अनौपचारिक रूप से 2010 के आसपास की थी। इस अभियान के अंतर्गत इन्होंने गृह जनपद बिजनौर और इसके बाहर इतिहास विषयक काफी कार्य किया गया विशेषकर गुमनाम सेनानियों पर । इस अभियान के अंतर्गत 45 गुमनाम सेनानियों की खोज की गई सैकड़ों तथ्यों को खोजा कई शोध पत्रों को लिखा गया अनेक लेख लिखे तथा कई पुस्तकें भी हेमन्त कुमार ने लिखी । इनकी खोज और पहल से कर्वी चित्रकूट में गुमनाम क्रांतिकारी विश्वनाथ वैशम्पायन जी का प्रथम शिलापट्ट स्थापित हुआ । कई सेनानियों के परिचय को पहली बार दीवारों और बैनर पर लिखवाया गया । सेनानियों के स्मृति चित्र बनाए उनसे जुड़े स्थल ढूंढे गए आदि। इसी क्रम में पूरन कोरी के वंशजों को ढूंढकर सम्मानित किया गया । गुमनाम सेनानियों की खोज और क्रांति की स्थानीय घटनाओं पर लेखन के लिए हेमन्त कुमार का नाम दो बार इंडिया बुक ऑफ रिकार्ड्स में दर्ज हो चुका है ।

