डॉ. दीपक अग्रवाल
अमरोहा/उत्तर प्रदेश (सनशाइन न्यूज)
- एक लड़की जिसका जन्म हुआ, छोटे से उस गाँव में,
जहाँ तकनीक न थी, बस प्रकृति थी अपनी छाँव में।
वो पली-बढ़ी उस धरती पर और अम्बर के साये में,
खुले आसमाँ के नीचे और मिट्टी की माया में। - कभी दादाजी की गोदी मिली, कभी पापा का कंधा सहारा था,
छूने को ऊँचा आसमाँ, उन्होंने ही मुझे उभारा था।
मैं बनी हूँ पंख फैलाकर, ऊँची उड़ानें भरने को,
पापा-मम्मी के हर सपने को, सच में तब्दील करने को। - माँ ने अपने पत्थर दिल पर, भारी बोझ उठाया था,
ताकि धुंधला न हो भविष्य मेरा, मुझे राह दिखाया था।
अच्छी शिक्षा मिल सके मुझे, खुद से दूर भेज दिया,
जहाँ नानी ने थमाई कलम, और मेरा जीवन सहेज दिया। - पापा ने मेरी हर ज़िद को, हँसकर पूरा कर डाला,
मम्मी जब भी पूछतीं कीमत, उन्होंने प्यार से सम्भाला।
वो कहते बच्चों की मुस्कान से, अनमोल चीज़ कुछ और नहीं,
इस दुनिया में कोई भी दौलत, इससे ज़्यादा और नहीं। - दादी के लज़ीज़ खाने से, मेरा मन भर जाता था,
उस घर की लाडली बिटिया पर, सबका प्यार उमड़ता था।
वो कहते थे अनमोल कली है, खुशियाँ इससे खिलती हैं,
ऐसी बेटी तो किस्मत से, हर आँगन में मिलती है।
वो कहते बच्चों की मुस्कान से, अनमोल चीज़ कुछ और नहीं,
इस दुनिया में कोई भी दौलत, इससे ज़्यादा और नहीं। - मेरे सपने और हौसले, आवाज़ से भी बुलंद थे,
सुनकर लोग ताने देते, जिनके विचार संकुचित और मंद थे।
वो कहते कैसे पूरे होंगे ये सपने, दिल मेरा दुखाते थे,
पर कान्हा का हाथ थामे हम, हर मुश्किल से टकराते थे। - चाहत है बस इतनी सी, अपनों के सपने पूरे हों,
कभी दादा-दादी तीर्थ करें, न कोई अरमान अधूरे हों।
नाना-नानी को खुशियाँ दूँ, और नए कपड़े पहनाऊँ,
मम्मी-पापा को आसमाँ की, मैं सैर कराकर लाऊँ। - छोटे गाँव से निकल पड़ी है, करने अपनों के सपने सच,
लेकर सबका आशीर्वाद, अब नहीं रही है कोई कसर।
थामे हाथ बुजुर्गों का, वो चल पड़ी है शान से,
मंज़िल की राह पर निकली है, अपने पूरे आत्मसम्मान से।
रक्षा सचान
बीएचएमएस-शिक्षार्थी
सिंह साहब होम्योपैथिक मेडिकल कॉलेज एण्ड हॉस्पिटल
गुलड़िया (अमरोहा) उत्तर प्रदेश

