डॉ. दीपक अग्रवाल
अमरोहा/उत्तर प्रदेश (सनशाइन न्यूज)
शिक्षक पात्रता परीक्षा की अनिवार्यता ने शिक्षकांे का जीना दूभर कर दिया है। टीईटी का चाबुक शिक्षकों को अपमानित करने सरीखा है। साथ ही यह भारतीय दर्शन की भी हत्या है जो नैतिक मूल्यों और मानवीय संवेदनाओं के सम्मान की बात करता है।
भारतीय दर्शन समूचे विश्व को मानवता, नैतिकता, सदाचार, विश्व-बंधुत्व और भाईचारे का संदेश देता है। भारतीय संस्कृति भी इसी विचार धारा का पोषण करती नजर आती है। कबीरदास ने तो भगवान से बढ़ा गुरु को दर्जा दिया है।
लाखों शिक्षकांे की नौकरी पर कैसे टीईटी का चाबुक चलाया सकता हैं ? टीईटी के मामले मंे केंद्र सरकार को आगे बढ़कर राहत देना का कार्य करना चाहिए।
लोकतंत्र में न्यायपालिका विधायिका से बड़ी नहीं है। कानून बनाने और संशोधन करने की ताकत संसद के पास है। उस कानून का पालन कराना न्यायपालिका का कार्य है। कोई कानून संविधान का तो उल्लंघन नहीं कर रहा है यह देखना न्यायपालिका कार्य है।
टीईटी का चाबुक शिक्षकों का अपमान/भारतीय दर्शन की हत्या

